सजा ए मौत के वो 4 बेरहम अंदाज, जिसे सुनकर जल्लाद भी जाएं कांप
कीलों वाली कुर्सी :-यूरोप में कुछ साल पहले तक अपराधी को सजा देने का सबसे अलग और खतरनाक तरीका अपनाया जाता था। अपराधी को कीलो बाली कुर्शी पर बैठा कर उसे बांध दिया जाता था। फिर उसके नीचे आग लगा कर रख दी जाती थी। जिसके बाद अपराधी के शरीर के बैठे हुए निचले हिस्से में आग पहुँचती थी तब बह उस कुर्शी से थोड़ा उठा था लेकिन बंधे होने की बजह से उसे फिर से बन्हि बैठना पड़ता था और कुर्शी पर मौजूद कीले लगातार उसके बदन को चुभती रहती थी और खून निकलता रहता था। और अंत में अपराधी की मृत्यु हो जाती थी।
2- कीलो वाला पिंजरा
मध्यकाल के समय में ही कैदियों के लिए एक विशेष तौर की सेल में रखा जाता था। जिसके हर हिस्से में लोहे की किले मौजूद होती थी। और फिर उनके साथ पूछ ताछ की जाती थी। गुनाह न कबूलने पर उन्हें उन किलो पर लिटा कर धकेला जाता था जो उनके शरीर को चीर कर रख देती थी।
3- सिर धड़ से अलग
दोस्तों 5-15 शताब्दी के बीच अपराधी को फांसी की बजाय एक तेज धार बाले ब्लेड के नीचे रखा जाता था। और उस अपराधी का सर उस जगह रखा जाता था जंहा ब्लेड गिरना होता था। मौत की सजा देने के लिए अपराधी के सर पर ब्लेड छोड़ दिया जाता था जिससे एक झटके के साथ ही अपराधी की गर्दन धड़ से अलग हो जाती थी।
4- पिरामिड की कुर्सी
कई सालो पहले अपराध की सजा देने के लिए एक और तरह की सजा का प्राबधान था उस सजा में कैदी को एक पिरामिड के आकर बाली कुर्शी पर बिठाया जाता था। उसके बाद उसके हांथो को बांध कर उन्हें खींचा जाता था। जिससे अपराधी का प्राइवेट पार्ट पूरी तरह से जख्मी हो जाता था
2- कीलो वाला पिंजरा
मध्यकाल के समय में ही कैदियों के लिए एक विशेष तौर की सेल में रखा जाता था। जिसके हर हिस्से में लोहे की किले मौजूद होती थी। और फिर उनके साथ पूछ ताछ की जाती थी। गुनाह न कबूलने पर उन्हें उन किलो पर लिटा कर धकेला जाता था जो उनके शरीर को चीर कर रख देती थी।
3- सिर धड़ से अलग
दोस्तों 5-15 शताब्दी के बीच अपराधी को फांसी की बजाय एक तेज धार बाले ब्लेड के नीचे रखा जाता था। और उस अपराधी का सर उस जगह रखा जाता था जंहा ब्लेड गिरना होता था। मौत की सजा देने के लिए अपराधी के सर पर ब्लेड छोड़ दिया जाता था जिससे एक झटके के साथ ही अपराधी की गर्दन धड़ से अलग हो जाती थी।
4- पिरामिड की कुर्सी
कई सालो पहले अपराध की सजा देने के लिए एक और तरह की सजा का प्राबधान था उस सजा में कैदी को एक पिरामिड के आकर बाली कुर्शी पर बिठाया जाता था। उसके बाद उसके हांथो को बांध कर उन्हें खींचा जाता था। जिससे अपराधी का प्राइवेट पार्ट पूरी तरह से जख्मी हो जाता था