कबीर नाहरगढ़ राजस्थान का रहने वाला था। बचपन से ही उसे घूमने का बहुत ही शौक था और साथ ही वह बहुत ही अच्छा फोग्राफर भी था। उसे कुदरत के नए -नए स्थानों को अपने कैमरे में कैद करना बहुत ही अच्छा लगता था। एक दिन कबीर जिला हनुमानगढ़ में एक नहर के पास खड़ा था। वह उस स्थान से लगभग पांच सौ मीटर दूर था, जहाँ से पानी ऊपर उठकर नीचे गिरता है। वह पानी को बहुत ही गौर से देख रहा था तभी अचानक उसकी नजर पड़ी कि पानी में कोई लड़की बहती जा रही है। पहले तो वह काफी डरा किन्तु फिर इंसानियत के नाते उसने पानी में छलांग लगा दी। पानी का वहाब बहुत तेज था। काफी संघर्ष के बाद कबीर ने उस लड़की को पानी से बाहर निकाला। लड़की पूरी तरह बेहोश थी। कबीर ने उसके पेट से पानी निकाला और उसने होश आने का इंतजार करने लगा। लेकिन उसे होश नहीं आ रहा था। अब तक काफी लोगों की भीड़ भी जमा हो गई थी। कबीर ने एक आदमी की मदद से उसे हनुमानगढ़ के एक अस्पताल में पहुंचाया। तीन घंटे बाद लड़की को होश आ गया।

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लड़की ने अपना सोफिया अहलावत बताया। वह हनुमानगढ़ के पास ही पीलीबंगा की रहने वाली थी। उसके पिता उस्मान अहलावत हनुमानगढ़ में ही एक बिल्डर थे। उस्मान करोड़ों की प्रापर्टी का मालिक था। उस दिन उस्मान और सोफिया के झगड़ा हो गया था। इसी लिए सोफिया ने नहर में छलांग लगा दी थी। लेकिन कबीर ने भगवान बनकर उसे बचा लिया। उस दिन के बाद कबीर ने भी हनुमानगढ़ में एक कमरा किराए पर लिया और वहीं रहने लगा। धीरे -धीरे कबीर और सोफिया के बींच काफी प्यार हो गया। अब जब भी समय मिलता सोफिया, कबीर के कमरे पर आ जाती और दोनों घंटों बात भी किया करते। इसके बाद उन दोनों के अन्दर प्यार की ऐसी चिंगारी निकली कि वो एक दूसरे के बिना जी नहीं पा रहे थे। सोफिया हनुमानगढ़ में ही एम. ए. कर रही थी। एक दिन कबीर ने सोफिया से शादी के लिए कहा तो उसने कहा मेरे पिता जी तैयार नहीं होंगे। कबीर ने कहा सोफिया यह सब तुम्हे पहले सोंचना चाहिए था। सोफिया ने कहा कबीर हम लोग यूं ही साथ रह सकते किन्तु शादी नहीं हो पायेगी।

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इसने बाद कबीर ने हनुमानगढ़ छोड़ दिया और अपने घर आ गया। धीरे-धीरे सोफिया की यादें कम हुईं। उसकी जिन्दगी पुनः पटरी पर दौड़ाने लगी। कबीर की अब कभी -कभी सोफिया से बात हो जाती थी। सोफिया के डूबने की घटना के ठीक तीन साल बाद 7 अक्टूबर 2019 को सोफिया ने कबीर को फोन किया और रोने लगी। उसने कहा कबीर मैं तुम्हारे बिना नहीं जिन्दा रह सकतीं हूँ। तुम आज शाम को आ जाओ और मैं भाग चलतीं हूँ। कबीर तो इस घड़ी का इंतजार कर रहा था।

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वह शाम आठ बजे सोफिया के बताये स्थान पर पहुँच गया। जब वह उस जगह पर पहुंचा तो वह हैरान रह गया। वहां सोफिया के पिता उस्मान और उसके साथ तीन लोग और खड़े थे। कबीर जैसे ही वहां पहुंचा उन चारों लोगों ने उसे जान से मार दिया। दरअसल हुआ ये था कि सोफिया को एक दिन उस्मान ने बात करते पकड़ लिया था। जब उसने दबाब से सोफिया से पूंछा तो उसने सारी बात बता दी। उस्मान का खून खौल गया और उसने कबीर को मारने के लिए सोफिया को ही इस्तेमाल कर लिया। सोफिया अगर चाहती तो कबीर को बचा सकती थी किन्तु शायद उसका प्यार भी कबीर के लिए एक धोखा था। आज कबीर तो नहीं है किन्तु सोफिया शायद उसे कभी भूल कर भी नहीं भूल पायेगी।